मंगलवार, 15 मार्च 2011

गुरुवार, 4 दिसंबर 2008

आतंक

कुछ माँओं ने लाल जने,
भारत माता के नाम।
न्योछावर कर जीवन को,
जो बने हिंद की शान।
हम क्या मोल चुकायेंगे,
जो बने हमारा अभिमान।
बड़ी देर से चुप हैं हम,
देख राजनीति का नंगा नाच।
चंद सिक्कों के स्वार्थ में,
उन्होंने बाँट दिया हमको,
देकर राज्य, जाती और धर्म का राग।
शहीदों की शहादत का,
अब तो कर्ज चुकाना होगा।
दिलों में ले जस्बों की मशाल,
अब तो बाहर आना होगा।
आपसी मतभेदों को भूल,
अब तो भाई-चारे के मजहब को अपनाना होगा।
उठे हुए आतंकी हाथों से,
भारत माता के दामन को हमें बचाना होगा।
बाँध सीर पे कफन शहीदों की श्रेणी में,
अब हमें भी अपना नाम लिखवाना होगा।
जयहिंद !






शुक्रवार, 21 सितंबर 2007

इंतज़ार


जीवन के इस प्रभात में ,
कुछ
दूर तक आओ चलें हम साथ में।

मिलने कि आस लिए ,
चातक कि सी प्यास लिए।

आपनी उम्मीदें नहीं खोयेंगें ,
जीवन मे कभी ना रोयेंगे।

इंतजार बहुत लम्बा हुआ ,
पर उम्र अभी भी बाकी है।

दो पलों के दर्द से,
यह ज़िन्दगी नहीं जाती है।

साहिल से टकराके,
लहरें
सागर में ही समाती हैं।









विरह

मेरे बारह बरस तो बीत गये ,
तेरे ख्वाबों और खयालों में ।
हरपल तुझको ही माँगा मैंनें ,
अपने ईस्ट के समक्ष दूआवों में ।
तुम इस भावुक मन के तानाशाह रहे ,
राज किया मेरे साँसों के गलियारों में
हर करवट सुनी थी मेरी ,
सावन कि अंगडाई भरी बहारों में ।
मेरे यौवन का रुप ढहा सब ,
तेरे विरह की तिक्ष्न व्यथावों में ।